भारतीय मुसलमानों को अपने नेतृृत्व की आवश्यकता, और उसका लाभ.

अगर मुसलमान खुद को राजनीतिक तौर पर मज़बूत करेंगे तो क्या होगा उसका लाभ?

भारतीय मुसलमानों को अपने नेतृृत्व की आवश्यकता, और उसका लाभ.
Imran Ghazi; File, Photo

भारतीय मुसलमानों को अपने नेतृृत्व की आवश्यकता क्यों है, और उसका लाभ क्या होगा ?

~ इमरान गाज़ी

जब भी कोई मुस्लिम क़यादत (मुस्लिम नेतृत्व) वाली पार्टी सिर उठाने की कोशिश करती है तो मुसलमान सेक्युलर दलों की उन अफवाहों को अंतिम शब्द समझ कर विश्वास कर लेते हैं कि वह पार्टी या ‘मुस्लिम क़यादात’ भाजपा की एजेंट, दलाल, बिकाऊ है। और फिर सब मिलकर इसी निराधार रणनीति का अनुसरण करने लग जाते हैं कि ‘मुस्लिम नेतृत्व’ वाली पार्टी को वोट देने से भाजपा जीत जाएगी।

देश की आज़ादी के बाद से 74 वर्षों की लंबी अवधि में, मुसलमानों की पूरी राजनीतिक रणनीति केवल एक ही बिंदु पर निर्भर रही है कि किसी भी तरह से सांप्रदायिक ताकतों को सत्ता में आने से रोका जा सके। इस रणनीति के तहत, इस अवधि में मुसलमानों ने हर उस पार्टी का समर्थन किया जो सांप्रदायिक ताकतों का विरोध करती थी या विरोध करती हुई दिखाई दी। इन पार्टियों में कांग्रेस सबसे आगे रही है।

तब से लेकर अब तक कई क्षेत्रीय दलों ने मुसलमानों का वोट पाने के लिए यही राजनीतिक हथकंडा अपनाया है और मुसलमानों के वोटों के सहारे बड़ी आसानी से सत्ता तक पहुंचने में कामयाब भी रहे. इन दलों में समाजवादी पार्टी, बहुजन समाज पार्टी, राष्ट्रिय जनता दल, जनता दल यूनाइटेड, तृणमूल कांग्रेस, वामपंथी और कई अन्य दल शामिल हैं।

जिनको देश के मुसलमान सांप्रदायक ताकतों को रोकने के लिए वोट देते और उनकी जीत का जश्न मनाते चले आ रहे हैं।

जब हम इस राजनीतिक रणनीति के परिणामों पर विचार करते हैं, तो यह बात सामने आती है कि आज सांप्रदायिक ताकतें कमजोर होने के बजाए देश की सबसे मजबूत ताकत बन गई हैं और मुसलमान शिक्षा, आर्थिक, सामाजिक, राजनीतिक और रोजगार सहित हर मामले में सबसे निचले स्तर पर पहुंच गए हैं।

इस रणनीति का उद्देश्य मुसलमानों को मजबूत करना था भी नहीं, बल्कि मुसलमानों को सुरक्षा प्रदान करके उनकी स्थिति को बनाए रखना था, लेकिन वह लक्ष्य भी हासिल नहीं हुआ। मुसलमानों को सुरक्षा प्रदान करने के बजाए हजारों दंगों और नरसंहारों के रूप में जुल्म और अन्याय मिला, और हत्यारों और संप्रदायवादियों को सजा के बजाय प्रोत्साहन और समर्थन मिला।

जिन राजनीतिक दलों ने मुसलमानों का वोट हासिल करने के लिए सांप्रदायिक ताकतों को खत्म करने का ठेका ले रखा था उन्हीं पार्टियों ने सांप्रदायिक ताकतों और दंगाइयों की रक्षा और पोषण करने का काम किया। मुसलमानों को हर तरफ से घेरकर, उन्हें सुविधाओं, रोजगार और अनुकूल परिस्थितियों से वंचित कर के दलितों से भी नीचे पहुंचा दिया गया।

यानी सांप्रदायिक ताकतों (बीजेपी और अन्य) को रोकने के लिए मुसलमानों द्वारा जो रणनीति अपनाई गई वह पूरी तरह विफल रही है। मुसलमानों की इस रणनीति के परिणाम का दूसरा पहलू यह है कि आज राष्ट्रीय राजनीति में मुसलमानों की न तो कोई भूमिका और न ही कोई उनका नाम लेने वाला है।

दूसरी ओर, आरएसएस फल-फूल कर इतनी शक्तिशाली ताकत बन गई है कि वह गर्व से दुनिया का सबसे बड़ा संगठन होने का दावा कर रही है। सैद्धांतिक रूप में, लोकतंत्र में बहुमत को हराना या रोकना अल्पसंख्यक के बस में नहीं है, न ही यह उनकी जिम्मेदारी है। बहुसंख्यक आबादी ही यह तय कर सकती है कि सत्ता किस को सौंपनी है, चाहे वह धर्मनिरपेक्ष हो या सांप्रदायिक, अल्पसंख्यक आबादी इस संबंध में कुछ नहीं कर सकती।

यानी देश की राजनीति का जो हिस्सा पूरी तरह से हमारी शक्ति और पहुंच से बाहर था, हमने उसे अपनी राजनीति का विषय बना लिया! वैसे भी किसी को बस रोकने की रणनीति अपने आप में एक नकारात्मक और त्रुटिपूर्ण रणनीति है। यह रणनीति रक्षात्मक स्थिति में होने के साथ मुसलमानों को आगे बढ़ने का कोई रास्ता नहीं दिखाती। इस रणनीति की इतनी बड़ी विफलता के बाद भी, आज का मुसलमान सांप्रदायिक ताकतों के डर से दूसरों के नेतृत्व वाली पार्टियों को वोट दे रहा है, जो आश्चर्यजनक है।

मौजूदा हालात को सामने रख कर देखा जाए तो यह बात साफ है कि बीजेपी, आरएसएस और उनके जैसे अन्य दलों और संगठनों को हराने, उनसे डरने-डराने का अब कोई मतलब नहीं रह गया है। क्योंकि आरएसएस की नज़र में तथाकथित धर्मनिरपेक्ष दलों की स्थिति इस समय क्या रह गई है वह सभी के सामने स्पष्ट है।

बहरहाल, इन तथाकथित धर्मनिरपेक्ष दलों के बयानों और मंशा के बीच खुला अंतर्विरोध अब कोई रहस्य नहीं रह गया है। खुद आरएसएस के नेता मीडिया में यह बात कह चुके हैं कि बीजेपी और कांग्रेस एक-दूसरे के बिना नहीं रह सकते। बाकी प्रक्रिया और परिणामों से बहुत पहले यह साबित हो गया है कि न तो इन पार्टियों के पास साम्प्रदायिक ताकतों को दबाने और रोकने की मंशा, साहस और न ही ताकत है।

यह सब तथ्य स्पष्ट होते हुए भी मुस्लिम संगठनों, बुद्धिजीवियों और शिक्षित वर्ग की स्थिति ऐसी है कि वे केवल भाजपा विरोधी और आरएसएस विरोधी बयानबाजी पर ये दूसरों के नेतृृत्व पर लट्टू हो जाते हैं। और अपने समुदाय को आतंकित करके अपंग बना देते हैं!

जब भी कोई मुस्लिम क़यादत (मुस्लिम नेतृत्व) वाली पार्टी सिर उठाने की कोशिश करती है तो दिन रात सेक्युलरिज़्म का पाठ पढ़ने वाले मुसलमान तथाकथित सेक्युलर दलों की उन अफवाहों को अंतिम शब्द समझ कर विश्वास कर लेते हैं कि वह पार्टी या ‘मुस्लिम क़यादात’ भाजपा की एजेंट, दलाल, बिकाऊ है। और फिर सब मिलकर इसी निराधार रणनीति का अनुसरण करने लग जाते हैं कि ‘मुस्लिम नेतृत्व’ वाली पार्टी को वोट देने से भाजपा जीत जाएगी।

मुसलमानों की राजनीतिक अंतर्दृष्टि और भोलेपन की हालत यह है कि इतनी सी बात पर मुसलमान अपने नेतृत्व से मोहभंग हो जाते हैं और उनसे दूरी बना लेते हैं। हालांकि भाजपा के जीतने और हारने से मुसलमानों के स्तिथि पर कोई ख़ास फर्क नहीं पड़ने वाला है।

मुसलमानों को समझना चाहिए कि यह धर्मनिरपेक्ष और सांप्रदायिक ताकतें मुसलमानों को सिर्फ इतना ही नुकसान पहुंचाएंगे और डराएंगे कि वे कभी एकजुट न हों और उन्हें आराम से बैठकर अपने भविष्य के बारे में सोचने का मौका न मिल सके। इसलिए अब मुसलमानों को चाहिए कि आरएसएस और भाजपा से डरने व डराने के खेल का हिस्सा बनने के बजाए इस से बाहर निकलें और अपने बेहतर भविष्य के लिए सोचें।

देश के मुसलमानों को राजनीतिक संकट से बाहर निकालने के लिए सबसे बेहतर समाधान ये है कि मुसलमान अन्य धार्मिक अल्पसंख्यकों, बल्कि दक्षिण भारतीय मुसलमानों की तरह अपने नेतृत्व का निर्माण करने और उसे मजबूत करने में लग जाएं। अगर मुसलमानों ने हार और जीत के परिणाम से बेफिक्र हो कर एक या दो दशक तक लगातार अपने नेतृत्व का समर्थन करेंगे तो यह बात दावे के साथ कही जा सकती है कि भविष्य में मुसलमानों के पास भी उनकी राजनीतिक शक्ति और एक ‘सामूहिक दबाव’ होगा।

और देश की तथाकथित धर्मनिरपेक्ष पार्टियों को उनकी शर्तों पर मुसलमानों के साथ गठबन्धन करने पर मजबूर होना पड़ेगा। लेकिन इसके लिए अस्थायी चिंताओं और आंशिक परिणामों की परवाह किए बिना अपने राजनीतिक दलों को अपना वोट करना होगा। केवल इसी तरह से मुसलमान गरिमापूर्ण जीवन और देश की राजनीति और सत्ता में अपना हिस्सा प्राप्त कर सकते हैं।

अपना खुद का नेतृत्व स्थापित करने के सवाल पर, कुछ मुस्लिम और तथाकथित धर्मनिरपेक्ष बुद्धिजीवी अक्सर इस बात पर आपत्ति जताते हैं कि अगर कोई मुसलमान अपनी राजनीतिक पार्टी बनाता है या मुस्लिम नेतृत्व वाली राजनीतिक पार्टी को एकजुट करता है और उसका समर्थन करता है, तो इससे देश में केवल सांप्रदायिकता बढ़ेगी। इस डर को अगर सही मान भी लिया जाए तो भी कुछ सवाल उठते हैं जो इस डर को निराधार साबित करते हैं:

  • पहली बात यह कि, आपके राजनीतिक तौर पर एकजुट होने से हिंदू भी एकजुट हो जाएंगे, ऐसा जरूरी नहीं है।

कारण यह है कि उनके पास पहले से ही कई बड़ी और क्षेत्रीय पार्टियां हैं जो किसी भी कीमत पर अपने अस्तित्व को खत्म नहीं होने देंगी। लेकिन मुसलमानों के पास ऐसी कोई बड़ी पार्टी नहीं है और आपके पास इस अंतर को भरने का अवसर है।

  • दूसरी बात, उत्पीड़न और अभाव के सही आधार पर एकजुट होना आसान है। ये चीज़ आपके पास है, उनके पास नहीं है।

  • तीसरी बात, बड़ी यूनिट के मुकाबले छोटी यूनिट को एकजुट करना ज़्यादा आसान होता है।

आबादी की एक बड़ी यूनिट के लिए लंबे समय तक एकजुट रहना असंभव है। जबकि छोटी यूनिट के लिए यह संभव है।

  • चौथी बात, अगर आपकी प्रतिक्रिया में हिंदू बहुसंख्यक एकजुट हो जाएं, तो यह मुसलमानों के लिए घाटे का सौदा नहीं होगा, क्योंकि कम से कम आप विपक्ष में तो होंगे, जब कि इस समय आप कहीं भी नहीं हो।

  • आखिरी और सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि अपनी पार्टी बनाने और धार्मिक आधार पर राजनीति करने में बहुत बड़ा अंतर है। बेहतर होगा कि मुसलमान, ब्राह्मणों, दलितों और यादवों की तरह खुद को एक समुदाय मानें और समुदाय के आधार पर अपना राजनीतिक नेतृत्व स्थापित करें/मजबूत करें। सक्रिय राजनीति आपका संवैधानिक अधिकार है, इस अधिकार को छोड़ना बहुत बड़ी भूल है। आप से बस यह कहा जा रहा है कि आप अपनी पार्टी और अपना नेतृत्व बनाएं लेकिन धर्म के आधार पर राजनीति से दूर रहें और समाजिक मुद्दों पर राजनिति करें।

अहम सवाल यह है कि क्या मुसलमानों के लिए अपने ही विनाश की कीमत पर सांप्रदायिकता को रोकना उचित होगा?

वास्तव में, जो लोग मुसलमानों द्वारा उनके राजनीतिक नेतृत्व पर सवाल उठाने पर आपत्ति जताते हैं, वे धर्मनिरपेक्षता और सांप्रदायिकता का सही अर्थ नहीं जानते हैं। साम्प्रदायिकों ने उनके दिमाग़ में यह बात बिठा दी है कि अगर देश का मुसलमान यदि अपने नेतृत्व के अलावा किसी अन्य धर्म या पंथ के नेतृत्व वाली पार्टी के पीछे चलता है, तो वह धर्मनिरपेक्ष है, लेकिन यदि मुसलमान अपना नेतृत्व स्थापित करना चाहते हैं या अपने नेतृत्व का समर्थन करना चाहते हैं, तो वह सांप्रदायिक है।

इसका यह मतलब निकलता है कि देश का मुसलमान दूसरों का नेतृत्व अपना सकता है और उनके पीछे चल सकता है, लेकिन देश के अन्य धर्म के लोग मुस्लिम नेतृत्व को न तो अपना सकते हैं और न ही उसका पालन कर सकते हैं।

वर्तमान समय में देश में प्रचलित धर्मनिरपेक्षता का यही समग्र अर्थ है। दूसरी ओर, संप्रदायवाद का वास्तविक अर्थ अपने समुदाय के हितों की रक्षा करना और साथ ही दूसरों के हितों का विरोध करना है।

इसके विपरीत देश का मुसलमान न केवल अपने हितों की बल्कि देश के हितों की भी रक्षा के लिए अपना राजनीतिक नेतृत्व स्थापित करना चाहता है बल्कि वह दूसरों के हितों, उनकी जायज मांगों और उनके विकास का विरोध नहीं करता है।

देश में प्रचलित धर्मनिरपेक्षता की प्रचलित व्याख्या के अनुसार देश के प्रत्येक राजनीतिक दल को साम्प्रदायिक कहा जाना चाहिए क्योंकि प्रत्येक दल का नेतृत्व किसी न किसी पंथ का होता है। साथ ही, यह हर दल का लोकतांत्रिक दायित्व है कि एक पार्टी बनाने के लिए, शुरुआत में एक बुनियादी वोट बैंक बनाने के लिए, उसे अपने समुदाय के मुद्दों का राजनीतिकरण करना होगा और यही देश की हर पार्टी ने अपने शुरुआती दिनों में किया था। जब पार्टी नेतृत्व अपने मूल वोट बैंक यानी अपने समुदाय से संतुष्ट होता है, तभी वह अन्य समुदायों के मुद्दों पर चर्चा करता है।

मुसलमानों की अब तक यह स्थिति रही है कि वे कभी भी एकजुट नहीं हुए और अपने बीच से उत्पन्न होने वाले किसी भी नेतृत्व के साथ दृढ़ता से खड़े नहीं रहे। यही कारण है कि मुस्लिम नेतृत्व अभी भी अपने समुदाय का समर्थन हासिल करने की कोशिश कर रहा है। राष्ट्रीय राजनीति में जगह बनाने के लिए मुस्लिम नेतृत्व के लिए जरूरी है कि वह न केवल मुसलमानों के भावनात्मक मुद्दों का राजनीतिकरण करे बल्कि अन्य समुदायों के हितों को भी सामने रखे और उन सभी को साथ लेकर चलने की कोशिश करे लेकिन ऐसा तभी हो सकता है। जब मुसलमान भी अपनी जिम्मेदारी को समग्र रूप से समझें और दलितों की तरह अपने नेतृत्व का समर्थन करें और मुस्लिम नेतृत्व को अपने समुदाय की तरफ से पूरी तरह संतुष्ट करें।

एक और बात जो स्पष्ट करने की आवश्यकता है, वह यह है कि व्यावहारिक क्षेत्र में “राजनीति” और “नेतृत्व” दोनों शब्दों के बीच बहुत बड़ा अंतर है!

वैसे तो राजनीति शब्द का शाब्दिक अर्थ नेतृत्व करना होता है, लेकिन व्यवहार में राजनीति का अर्थ कुछ और ही होता है। देखा जाए तो यह बेवकूफ बनाने की एक कला है।

देश में अधिकांश राजनीतिक दल केवल अपने समुदाय का नेतृत्व करते हैं जो उनका मुख्य वोट बैंक है जबकि वे केवल दूसरों के साथ या दूसरों के मुद्दों पर राजनीति करते हैं। इस गंदी और शोषक राजनीति में सभी दल शामिल हैं। दलितों का नेतृत्व बसपा करती है, यादवों का नेतृत्व सपा करती है, भाजपा और कांग्रेस उच्च जाति के हिंदुओं का नेतृत्व करती हैं, लेकिन ये सभी पार्टियां मुसलमानों के साथ और उनके मुद्दों पर सिर्फ राजनीति करते हैं।

धर्मनिरपेक्षता की आड़ में शोषण की इस परंपरा को तोड़ा जा सकता है अगर मुस्लिम नेतृत्व को मुख्यधारा और राष्ट्रीय राजनीति में आगे बढ़ने का मौका दिया जाए, अन्यथा मुसलमानों की राजनीतिक स्थिति में बदलाव की कोई संभावना नहीं है। अगर मुसलमान दूरदर्शिता के साथ काम नहीं करते और अपने राजनीतिक नेतृत्व को मजबूत नहीं करते हैं, तो तथाकथित राजनीतिक दलों को परखने और दूसरों की जीत का जश्न मनाने की यह मजबूरी उनकी नियति बनी रहेगी।